हमारी चपाल, 05,08,2026
अनुराग गुप्ता
देहरादून। जनपद देहरादून के झाझरा क्षेत्र में करोड़ों रुपये मूल्य की सरकारी भूमि से जुड़े बहुचर्चित प्रकरण में विशेष जांच दल (एसआईटी-भूमि) की जांच ने कई गंभीर तथ्य उजागर किए हैं। जांच में प्रथम दृष्टया यह सामने आया है कि एक ही भूमि का दो अलग-अलग व्यक्तियों एवं संस्थाओं के पक्ष में विक्रय किया गया। इतना ही नहीं, जिस भूमि पर राज्य सरकार का स्वामित्व दर्ज हो चुका था और जिसका एक हिस्सा आपदा प्रबंधन विभाग को आवंटित किया जा चुका था, उसी भूमि का बाद में पुनः विक्रय कर दिया गया। एसआईटी ने मामले को प्रथम दृष्टया धोखाधड़ी का मामला मानते हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, देहरादून को मुकदमा दर्ज कर विधिक कार्रवाई करने की संस्तुति की । साथ ही पूरे प्रकरण में शामिल अन्य व्यक्तियों की भूमिका की भी गहन विवेचना कराने की आवश्यकता बताई लेकिन एस आई टी की जांच रिपोर्ट और आई जी के निर्देशों के सात साल बाद भी मुकदमा दर्ज नहीं हो सका।
मामले की शुरुआत सेवानिवृत्त निरीक्षक एवं सामाजिक कार्यकर्ता कुँवर सिंह, निवासी ग्राम झाझरा, थाना प्रेमनगर द्वारा दी गई शिकायत से हुई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि मौजा झाझरा की पुरानी खसरा संख्या 599 (वर्तमान खसरा संख्या 1166ड एवं 1171घ) की भूमि के संबंध में सुनियोजित तरीके से धोखाधड़ी की गई। शिकायत मिलने के बाद प्रकरण की जांच एसआईटी (भूमि) शाखा को सौंपी गई। जांच के दौरान उपलब्ध राजस्व अभिलेखों एवं दस्तावेजों से पता चला कि संबंधित भूमि मूल रूप से श्याम लाल पुत्र कालू के नाम दर्ज थी। दिनांक 19 जुलाई 1995 को श्याम लाल ने उक्त भूमि का पंजीकृत मुख्तारनामा (पावर ऑफ अटॉर्नी) दिगपाल सिंह पुत्र बनवारी सिंह, निवासी सहसपुर के नाम निष्पादित किया। एसआईटी ने मुख्तारनामे के गवाहों के बयान भी दर्ज किए। गवाहों ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि मुख्तारनामा उनके समक्ष निष्पादित हुआ था।
मुख्तारनामे के आधार पर दिगपाल सिंह ने 23 अक्टूबर 1996 को उक्त भूमि का विक्रय पत्र कन्या प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड (एनएच-22, निकट अंबाला, पंजाब) के पक्ष में पंजीकृत कराया। इस प्रकार भूमि का स्वामित्व कंपनी के पक्ष में स्थानांतरित हो गया। जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि न्यायालय सहायक कलेक्टर प्रथम श्रेणी/परगनाधिकारी, विकासनगर द्वारा वाद संख्या 15ए/1999-2000 में 2 जून 2003 को पारित आदेश के बाद उक्त भूमि का खातेदार नाम निरस्त कर भूमि उत्तराखंड राज्य सरकार के नाम दर्ज कर दी गई। इसके बाद खसरा संख्या 1171घ का 0.5410 हेक्टेयर क्षेत्रफल शासनादेश दिनांक 19 अप्रैल 2011 के तहत उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग को आवंटित कर दिया गया।
एसआईटी जांच में सामने आया कि श्याम लाल ने बाद में दावा किया कि उसने दिगपाल सिंह को कोई मुख्तारनामा नहीं दिया था। इस आधार पर उसने सिविल न्यायालय में विक्रय पत्र एवं मुख्तारनामा निरस्त कराने के लिए मूल वाद संख्या 408/2008 दायर किया। मामले की सुनवाई के बाद 18 अप्रैल 2011 को सिविल जज (सीनियर डिवीजन) ने यह कहते हुए वाद खारिज कर दिया कि वादी अपने आरोप सिद्ध करने में असफल रहा है। इसके बाद श्याम लाल ने जिला न्यायाधीश, देहरादून के समक्ष दीवानी अपील संख्या 51/2011 दायर की, लेकिन वहां भी उसे राहत नहीं मिली और अपील खारिज कर दी गई।
एसआईटी की जांच में यह भी सामने आया कि वर्ष 2015 में श्याम लाल ने अपर आयुक्त, गढ़वाल मंडल के समक्ष निगरानी याचिका दायर की। इस दौरान उसने राजस्व न्यायालय के आदेश को चुनौती दी, लेकिन सिविल न्यायालय एवं जिला न्यायालय द्वारा उसके विरुद्ध दिए गए निर्णयों की जानकारी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं की।
जांच रिपोर्ट के अनुसार, इन महत्वपूर्ण तथ्यों के अभाव में अपर आयुक्त द्वारा 1 मई 2015 को श्याम लाल का नाम पुनः राजस्व अभिलेखों में दर्ज करने का आदेश पारित कर दिया गया। एसआईटी के अनुसार, राजस्व अभिलेखों में नाम पुनः दर्ज होने के तुरंत बाद श्याम लाल ने भूमि का पुनः विक्रय शुरू कर दिया। 1 जुलाई 2015 को खसरा संख्या 1166ड का पूरा रकबा कमल सिंह एवं डोगल सिंह के नाम विक्रय कर दिया गया और 3 मई 2016 को खसरा संख्या 1171घ का पूरा रकबा दीपक आनंद के नाम विक्रय कर दिया गया। जांच में स्पष्ट हुआ कि यही भूमि पहले वर्ष 1996 में कन्या प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड को बेची जा चुकी थी। इस प्रकार एक ही भूमि के पूर्ण रकबे के दो अलग-अलग विक्रय पत्र निष्पादित किए गए।
सबसे गंभीर तथ्य यह सामने आया कि जिस भूमि का एक हिस्सा पहले ही राज्य सरकार के नाम दर्ज हो चुका था और बाद में आपदा प्रबंधन विभाग को आवंटित किया जा चुका था, उसका भी निजी व्यक्तियों के पक्ष में विक्रय कर दिया गया। इससे सरकारी संपत्ति से जुड़े गंभीर कानूनी प्रश्न खड़े हो गए हैं। एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पूरे प्रकरण में कमल सिंह, दीपक आनंद, संजय कुमार, अमित कुमार वर्मा तथा पिंकी देवी की भूमिका की भी विस्तृत विवेचना आवश्यक है। इन सभी की संलिप्तता के संबंध में साक्ष्य संकलित किए जाने की आवश्यकता बताई गई है। एसआईटी ने अपनी जांच पूरी करने के बाद शिकायतकर्ता का मूल प्रार्थना पत्र वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, देहरादून को भेज दिय। रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उपलब्ध दस्तावेजों एवं साक्ष्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया धोखाधड़ी का अपराध बनता है।
एसएसपी से इस प्रकरण में तत्काल अभियोग पंजीकृत कर निष्पक्ष विवेचना कराने और दोषियों के विरुद्ध विधिसम्मत कार्रवाई सुनिश्चित कर इस कार्रवाई की सूचना एसआईटी कार्यालय को उपलब्ध को कहा गया था लेकिन सात साल बाद भी इस मामले में न तो अभियोग पंजीकृत हुआ और न ही कोई कार्रवाई की गयी।
जांच के प्रमुख निष्कर्ष
एक ही भूमि का दो बार विक्रय किए जाने के प्रमाण मिले।
पंजीकृत मुख्तारनामा के आधार पर वर्ष 1996 में पहला विक्रय हुआ।
बाद में वही भूमि दोबारा अन्य व्यक्तियों के नाम बेची गई।
सिविल न्यायालय और अपीलीय न्यायालय दोनों में दावा खारिज होने के बावजूद राजस्व अभिलेखों में नाम पुनः दर्ज कराया गया।
जांच में न्यायालय से महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाए जाने की बात सामने आई।
राज्य सरकार एवं आपदा प्रबंधन विभाग को आवंटित भूमि के भी विक्रय के प्रमाण मिले।
एसआईटी ने प्रथम दृष्टया धोखाधड़ी मानते हुए एफआईआर दर्ज करने की संस्तुति की है।
