हमारी चौपाल | देहरादून।
उत्तराखंड में हिमालयी ग्लेशियल झीलों से उत्पन्न होने वाले संभावित खतरों की निगरानी और समय रहते चेतावनी जारी करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। चमोली जनपद स्थित वसुंधरा ताल में पहली बार आधुनिक सेंसर आधारित पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने का पहला चरण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। इस चुनौतीपूर्ण अभियान को पूरा करने के बाद वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल वापस लौट आया है। मंगलवार को उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) में सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने दल का स्वागत किया।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए इसे आपदा जोखिम न्यूनीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया। मुख्यमंत्री ने कहा कि पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों से उत्पन्न संभावित खतरों की समय रहते पहचान करना बेहद जरूरी है। आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक अनुसंधान और विभिन्न संस्थानों के समन्वय से आपदा प्रबंधन व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है। वहीं, मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि इस प्रणाली से झील के जलस्तर, मौसम, बर्फ की स्थिति और प्राकृतिक गतिविधियों से संबंधित महत्वपूर्ण आंकड़े प्राप्त करने में मदद मिलेगी।
38.50 मीटर गहरी झील पर अत्याधुनिक सेंसरों की निगरानी
वसुंधरा ताल में स्थापित प्रणाली के अंतर्गत मौसम, जलस्तर, बर्फ और भू-गतिविधियों की निगरानी के लिए विभिन्न प्रकार के सेंसर लगाए गए हैं। झील की गहराई लगभग 38.50 मीटर, चौड़ाई 600 मीटर और लंबाई 900 मीटर बताई गई है। मौसम संबंधी आंकड़े जुटाने के लिए ऑल-इन-वन मौसम सेंसर लगाया गया है, जो हवा की गति एवं दिशा, वर्षा, सौर विकिरण, तापमान और वायुदाब को मापेगा।
इसके अतिरिक्त झील के जलस्तर की निगरानी के लिए फ्लोटिंग और सबमर्ज्ड वाटर लेवल सेंसर लगाए गए हैं। संभावित बाढ़ से संबंधित कंपन, झुकाव और भू-गतिविधियों पर नजर रखने के लिए एक्सेलेरोमीटर एवं टिल्ट सेंसर स्थापित किए गए हैं। हिमस्खलन संबंधी गतिविधियों की निगरानी के लिए भी अतिरिक्त सेंसर लगाए गए हैं। बर्फ की गहराई मापने और उसकी विभिन्न परतों के तापमान का पता लगाने के लिए स्नो डेप्थ सेंसर तथा सात तापमान सेंसर स्थापित किए गए हैं। झील की सतह के तापमान को मापने के लिए अलग सेंसर भी लगाया गया है।
हर दो घंटे में पहुंचेगा आंकड़ा, आपात स्थिति में तत्काल सूचना
प्रणाली की खासियत यह है कि सामान्य परिस्थितियों में सेंसर प्रत्येक दो घंटे में आंकड़े केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की और यूएसडीएमए में स्थापित डैशबोर्ड तक भेजेंगे। किसी आपातकालीन परिस्थिति में निर्धारित दो घंटे के अंतराल की प्रतीक्षा किए बिना तत्काल आंकड़े भेजने की व्यवस्था भी की गई है। इससे झील और उसके आसपास होने वाले असामान्य बदलावों की समय रहते पहचान करने में सहायता मिल सकती है।
वसुंधरा ताल के दुर्गम उच्च हिमालयी क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होने के कारण उपकरणों को इरिडियम उपग्रह संचार तकनीक से जोड़ा गया है। अभियान दल ने वापसी से पहले आंकड़ों के संचार की कार्यप्रणाली का परीक्षण किया, जिसमें डेटा का आदान-प्रदान अपेक्षानुसार पाया गया।
सौर ऊर्जा से चलेगी प्रणाली, दस दिन तक बैकअप
दुर्गम क्षेत्र में बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्रणाली में सौर पैनल और बैटरी की व्यवस्था की गई है। इसमें 280 एम्पीयर क्षमता की बैटरी लगाई गई है, जो पर्याप्त धूप नहीं मिलने की स्थिति में लगभग दस दिनों तक बैकअप देने में सक्षम बताई गई है। इससे प्रतिकूल मौसम में भी उपकरणों का संचालन जारी रखने में मदद मिलेगी।
उपकरणों को सुरक्षित रखने के लिए स्टील के मॉड्यूलर डिजाइन पर आधारित फाउंडेशन तैयार किया गया है। इसमें स्थानीय सामग्री और पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है तथा सीमेंट का प्रयोग नहीं किया गया। क्षेत्र में हवा की गति लगभग 15 से 50 किलोमीटर प्रति घंटा आंकी गई है, जबकि फाउंडेशन का डिजाइन 100 किलोमीटर प्रति घंटा तक की हवा की गति को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
सीबीआरआई और वाडिया संस्थान के वैज्ञानिकों ने निभाई अहम भूमिका
यूएसडीएमए के सचिव विनोद कुमार सुमन के अनुसार, राष्ट्रीय ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के अंतर्गत यह अभियान संचालित किया गया। इसमें सीबीआरआई, रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिकों एवं तकनीकी विशेषज्ञों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अभियान को सफल बनाने में राज्य आपदा प्रतिवादन बल (एसडीआरएफ), राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) का भी सहयोग रहा।
मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने कहा कि इस प्रणाली से प्राप्त आंकड़ों की नियमित निगरानी और वैज्ञानिक विश्लेषण के माध्यम से झील एवं आसपास के क्षेत्र में होने वाले महत्वपूर्ण बदलावों को समझने में मदद मिलेगी। अभियान दल के प्रमुख एवं सीबीआरआई, रुड़की के वैज्ञानिक डॉ. डीपी कानूनगो ने बताया कि उपलब्ध पूर्व आंकड़ों और वर्तमान स्थिति के अनुसार झील के आकार में कोई विशेष बदलाव नहीं देखा गया है। उपकरणों की स्थापना के लिए ऐसे स्थान का चयन किया गया, जहां भूस्खलन और हिमस्खलन का जोखिम अपेक्षाकृत कम है।
वसुंधरा ताल में पूर्व चेतावनी प्रणाली की स्थापना से उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की वैज्ञानिक निगरानी को मजबूती मिलने की उम्मीद है। हालांकि, संभावित आपदा की प्रभावी चेतावनी के लिए सेंसर से प्राप्त आंकड़ों का नियमित विश्लेषण, संचार व्यवस्था का निरंतर संचालन और संबंधित विभागों के बीच त्वरित समन्वय महत्वपूर्ण रहेगा।
वसुंधरा ताल में स्थापित हुई उत्तराखंड की पहली ग्लेशियल झील पूर्व चेतावनी प्रणाली, वैज्ञानिक दल लौटा
जलस्तर, मौसम, बर्फ और भू-गतिविधियों पर रहेगी नजर, हर दो घंटे में डैशबोर्ड पर पहुंचेगा आंकड़ा
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