अनुराग गुप्ता
देहरादून। शिमला बाईपास के पास ग्राम शेरपुर में करीब 15 बीघा जमीन पर अवैध कब्जे के खिलाफ प्रशासन का पीला पंजा गरजा। जेसीबी ने मौके पर पहुंचकर अवैध निर्माण और कब्जे को ध्वस्त करने की कार्रवाई शुरू की तो इलाके में हड़कंप मच गया। कार्रवाई को लेकर जहां प्रशासन अपनी सख्ती दिखा रहा है, वहीं अब सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि सिर्फ जेसीबी चलेगी या अवैध कब्जा कराने वालों पर भी कानूनी कार्रवाई होगी?
सूत्रों के अनुसार, जिस जमीन पर कार्रवाई की जा रही है, उसमें ग्राम समाज और नदी श्रेणी की जमीन पर कथित रूप से कब्जा कर प्लाटिंग किए जाने के आरोप हैं। यह भी आरोप है कि जमीन को छोटे-छोटे प्लाटों में काटकर आम लोगों को बेचने का प्रयास किया गया। यदि ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो मामला केवल अवैध निर्माण हटाने तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि जमीन की खरीद-फरोख्त और उससे जुड़े लोगों की भूमिका की भी जांच का विषय बनता है।
पीला पंजा चला, अब कानून का पंजा कब चलेगा?
प्रशासन की कार्रवाई के बाद स्थानीय स्तर पर सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि जिन लोगों ने कथित तौर पर सरकारी/नदी श्रेणी की जमीन पर कब्जा कर प्लाटिंग की, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई होगी? क्या केवल जेसीबी से निर्माण गिराकर मामला खत्म हो जाएगा या कब्जे के पीछे मौजूद लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ भी मुकदमा और अन्य कानूनी कार्रवाई होगी?
आम लोगों का सवाल भी सीधा है—अगर जमीन सरकारी थी तो उस पर प्लाटिंग कैसे हुई, प्लाट कैसे बिके और खरीददारों तक यह जमीन कैसे पहुंची?
‘मकान गिरा, मगर मालिक कौन?’
शेरपुर की कार्रवाई ने एक बार फिर जमीनों की अवैध प्लाटिंग और सरकारी भूमि पर कब्जे के खेल पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कार्रवाई का असली असर तभी माना जाएगा जब कब्जा हटाने के साथ-साथ कब्जे के लिए जिम्मेदार लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आए।
फिलहाल जेसीबी अपना काम कर रही है और अवैध कब्जे पर प्रशासन का बुलडोजर चल रहा है। लेकिन असली परीक्षा अब यह है कि पीला पंजा जमीन तक ही रुकता है या कानून का पंजा उन लोगों तक भी पहुंचता है, जिन्होंने कथित तौर पर इस पूरी प्लाटिंग की नींव रखी।
