देहरादून, 20 अगस्त। प्रकृति के चितेरे एवं हिमवंत कवि चंद्रकुंवर बर्त्वाल की 107वीं जयंती के अवसर पर देहरादून स्थित चौपाल कार्यालय में कार्यक्रम आयोजित किया गया। हिमवंत कवि चंद्रकुंवर बर्त्वाल शोध संस्थान की ओर से आयोजित कार्यक्रम में कवि की साहित्यिक विरासत को याद करते हुए उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए राज्य सरकार से ठोस पहल की मांग की गई। इस अवसर पर हिमवंत कवि की स्मारिका का विमोचन किया गया तथा संस्थान के पूर्व सदस्य एवं पूर्व आईएएस अधिकारी चंद्र सिंह के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता शोध संस्थान के अध्यक्ष मनोहर सिंह रावत ने की। उन्होंने कहा कि चंद्रकुंवर बर्त्वाल हिंदी साहित्य के ऐसे कवि थे, जिन्होंने अल्पायु में ही साहित्य को समृद्ध करने वाली अमूल्य रचनाएं दीं। उन्होंने चंद्रकुंवर बर्त्वाल और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की साहित्यिक संवेदना में समानता का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों ही कवियों ने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद साहित्य को नई दिशा दी।
काव्य गोष्ठी में कवि की रचनाओं का वाचन एवं गायन किया गया। गिरधर पंडित और डॉ. पुष्पा खडूरी ने हिमवंत कवि की कविताओं का गायन कर श्रोताओं को भावविभोर किया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि चौपाल संयोजक सुरेंद्र कुमार ने कहा कि चंद्रकुंवर बर्त्वाल ने मात्र 28 वर्ष का जीवन जीकर हिंदी साहित्य को विशाल काव्य भंडार दिया। उन्होंने बताया कि चंद्रकुंवर बर्त्वाल का जन्म 20 अगस्त 1919 को रुद्रप्रयाग जिले की तल्ला नागपुर पट्टी के मालकोटी गांव में भोपाल सिंह एवं जानकी देवी के घर हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा उडामांडा प्राथमिक विद्यालय तथा मिडिल शिक्षा नागनाथ, पोखरी से प्राप्त करने के बाद उन्होंने पौड़ी, देहरादून और इलाहाबाद से उच्च शिक्षा हासिल की। छात्र जीवन से ही उन्होंने कविता लेखन शुरू कर दिया था।
विशिष्ट अतिथि राजेंद्र प्रसाद रतूड़ी ‘निर्मल’ ने कवि की कविता सुनाकर अपने वक्तव्य की शुरुआत की। उन्होंने चंद्रकुंवर बर्त्वाल की प्रमुख कृतियों—नंदिनी, पयस्विनी, विराट ज्योति, हिमवंत का एक कवि, काफल पाक्कू, हिरण्यगर्भ, गीत माधवी, साकेत, उदय के द्वारों पर, प्रणयिनी और हिम ज्योत्सना—का उल्लेख किया।
समर भंडारी ने कहा कि कवि के मित्र शंभू प्रसाद बहुगुणा ने उनकी विलुप्त होती रचनाओं को संकलित कर प्रकाशित कराया। इसके बाद काव्य जगत में चंद्रकुंवर बर्त्वाल का नाम ‘हिमवंत कवि’ के रूप में और अधिक प्रसिद्ध हुआ।
वक्ताओं ने बताया कि इलाहाबाद में क्षय रोग से पीड़ित होने के बाद चंद्रकुंवर बर्त्वाल अपने गांव मालकोटी लौट आए। कुछ समय उन्होंने अगस्त्यमुनि मिडिल स्कूल में अध्यापन किया। बाद में कंचनगंगा और मंदाकिनी के तट पर स्थित पंवालिया (भीरी) में रहने लगे। इसी स्थान पर उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण रचनाएं लिखीं, जिन्हें देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित किया गया।
ट्रेड यूनियन नेता जगदीश कुकरेती ने कहा कि पंवालिया में ही कवि ने अपने जीवन का अंतिम समय बिताया और उन्हें अपनी मृत्यु का आभास हो गया था।
कार्यक्रम का संचालन संस्थान के उपाध्यक्ष मोहन सिंह नेगी ने किया। काव्य गोष्ठी में कुसुम रावत, समर भंडारी, जगदीश कुकरेती, द्विजेंद्र बहुगुणा, वीरेंद्र दत्त, सत्यप्रकाश चौहान, निरंजन सुयाल, ललित बिष्ट, ललित ओझा, हरिओम पाली, विजय पाहवा, डॉ. गोविल, नरेंद्र बिष्ट, राकेश सती, विनोद खंडूरी, जमन सिंह बिष्ट, राजेश रावत सहित साहित्यप्रेमी एवं गणमान्य लोग मौजूद रहे।
हिमवंत कवि चंद्रकुंवर बर्त्वाल की 107वीं जयंती पर स्मृति को चिरस्थायी बनाने की मांग
स्मारिका का विमोचन, पूर्व आईएएस चंद्र सिंह को श्रद्धांजलि; काव्य गोष्ठी में कवि की रचनाओं का हुआ वाचन
4
