अल्मोड़ा(आरएनएस- विनोद जोशी)। नगर में दशहरा महोत्सव की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। विभिन्न मोहल्लों में रावण और उसके कुल के पात्रों के कलात्मक पुतले तैयार किए जा रहे हैं। लोककला, सामाजिक सौहार्द और सामूहिक सहभागिता का प्रतीक अल्मोड़ा का दशहरा अपनी अनूठी परंपरा के लिए देश-विदेश में पहचान रखता है। पुतलों की शोभायात्रा इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण होती है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं। अल्मोड़ा में पुतला दहन की परंपरा वर्ष 1860 से शुरू मानी जाती है। शुरुआत में केवल रावण का पुतला बनाया जाता था, लेकिन समय के साथ यह परंपरा विस्तारित हुई और रावण कुल के अन्य पात्रों के पुतले भी बनाए जाने लगे। एक पुतले से शुरू हुआ यह आयोजन एक समय दो दर्जन से अधिक पुतलों तक पहुंच गया था। हालांकि, वर्तमान में पुतलों की संख्या में कुछ कमी आई है, लेकिन इसकी सांस्कृतिक पहचान आज भी कायम है। दशहरे की खासियत पुतलों की विविधता और उनके निर्माण में स्थानीय कलाकारों का हुनर है। चेहरे, वेशभूषा और सजावट में उनकी कल्पनाशीलता दिखाई देती है। नवरात्र से पहले ही मोहल्लों में पुतले बनाने का काम शुरू हो जाता है। इसमें विभिन्न मोहल्लों और समुदायों के लोगों की भागीदारी आयोजन को सामाजिक एकता और साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बनाती है। यह परंपरा स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर भी देती है। समय के साथ पुतला निर्माण की तकनीक और सामग्री में बदलाव आया है। बांस और पराली के पारंपरिक इस्तेमाल के साथ अब लोहे के ढांचे और अन्य सजावटी सामग्रियों का भी उपयोग किया जाने लगा है। इस ऐतिहासिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए नई पीढ़ी को पुतला निर्माण और सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़ना जरूरी है। वरिष्ठ कारीगरों के अनुभव और पारंपरिक कला को सहेजने के प्रयासों से अल्मोड़ा के दशहरे की मौलिक पहचान आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाई जा सकती है।
अल्मोड़ा के दशहरे की अनूठी विरासत, रावण कुल के कलात्मक पुतलों से देश-विदेश में पहचान
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