अनुराग गुप्ता
देहरादून। उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों की बदहाली दूर करने के लिए केंद्र सरकार पैसा देती रही और शिक्षा विभाग उस पैसे को खर्च करने में ही नाकाम साबित होता रहा। समग्र शिक्षा के तहत पिछले वित्तीय वर्ष में राज्य को 560 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि मिली, लेकिन विभाग की सुस्त कार्यप्रणाली के चलते करीब 100 करोड़ रुपये लैप्स हो गए। सवाल यह है कि जब पैसा उपलब्ध था तो काम क्यों नहीं हुआ और इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
समग्र शिक्षा की रिपोर्ट ने विभाग की कार्यप्रणाली की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न मदों में स्वीकृत 1042 निर्माण कार्य अभी तक अधूरे हैं। इनमें वे काम भी शामिल हैं जो सरकारी स्कूलों में बच्चों की मूलभूत जरूरतों से सीधे जुड़े हैं। अतिरिक्त कक्षा-कक्ष, छात्र-छात्राओं के शौचालय, कंप्यूटर कक्ष, पुस्तकालय और विज्ञान प्रयोगशालाएं तक समय पर तैयार नहीं हो सकीं।
आंकड़े खुद विभाग की कहानी बता रहे हैं। 642 अतिरिक्त कक्षा-कक्ष स्वीकृत हुए, लेकिन 142 अधूरे हैं। छात्राओं के 606 शौचालयों में 115 और छात्रों के 484 शौचालयों में 85 काम पूरे नहीं हुए। 246 आर्ट-क्राफ्ट कक्षों में 41, 1068 मुख्य मरम्मत कार्यों में 239, 177 कंप्यूटर कक्षों में 47, 224 पुस्तकालयों में 35 और 777 विज्ञान प्रयोगशालाओं में 173 कार्य अधूरे पड़े हैं। यानी जिस व्यवस्था का दावा सरकारी स्कूलों में आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने का है, उसी व्यवस्था में करोड़ों रुपये उपलब्ध होने के बावजूद स्कूलों के जरूरी निर्माण कार्य कागजों और अधूरी साइटों में अटके हुए हैं।
यह मामला सिर्फ निर्माण कार्यों में देरी का नहीं है। असली सवाल जवाबदेही का है। निर्माण एजेंसियों के साथ विद्यालय के प्रधानाचार्य, खंड शिक्षा अधिकारी, जिला शिक्षा अधिकारी और मुख्य शिक्षा अधिकारी तक निगरानी व्यवस्था का हिस्सा हैं। इसके बावजूद इतने बड़े पैमाने पर काम अधूरे कैसे रह गए?
विडंबना देखिए कि पिछले साल मिली धनराशि का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाया और अब केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने 29 जून 2026 को समग्र शिक्षा के तहत उत्तराखंड के लिए 676 करोड़ रुपये की मंजूरी दे दी है। यह धनराशि अभी राज्य को मिलना बाकी है। नई धनराशि आने से पहले ही पुरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े हो चुके हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब पिछली ग्रांट का बड़ा हिस्सा समय पर खर्च नहीं किया जा सका तो नई धनराशि के लिए विभाग ने क्या ठोस कार्ययोजना तैयार की है ?
वहीं दूसरी ओर शिक्षा मंत्री धनसिंह राावत का कहना है कि समग्र शिक्षा की समीक्षा बैठक में करोड़ों रुपये लैप्स होने पर अधिकारियों को फटकार लगाई गई और भविष्य में धनराशि का शत-प्रतिशत उपयोग सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए। स्वीकृत निर्माण कार्यों को समयबद्ध तरीके से पूरा करने को कहा है। लेकिन सरकारी सिस्टम में फटकार और निर्देश कोई नई बात नहीं हैं। असली सवाल यह है कि क्या इस बार किसी की जिम्मेदारी तय होगी? क्योंकि यदि हर वित्तीय वर्ष में केंद्र से पैसा आता रहे, काम स्वीकृत होते रहें, निर्माण कार्य अधूरे पड़े रहें और पैसा लैप्स होता रहे, तो फिर समीक्षा बैठकों और अधिकारियों को दी जाने वाली फटकार का आखिर मतलब क्या है?
सरकार को यह बताना होगा कि 100 करोड़ रुपये लैप्स होने के लिए जिम्मेदार कौन है और 1042 अधूरे निर्माण कार्यों की जवाबदेही किस अधिकारी की है। वरना समग्र शिक्षा के नाम पर हर साल करोड़ों का बजट स्वीकृत होने के बावजूद सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदलने के दावे महज कागजी साबित होते रहेंगे।
आखिर क्यों हुयी लापरवाही:-
क्या अधिकारियों ने समय पर निरीक्षण नहीं किया?
क्या निर्माण एजेंसियों पर कोई दबाव नहीं बनाया गया?
क्या भुगतान और निर्माण की प्रक्रिया में कोई अड़चन थी?
या फिर बजट खर्च करने को लेकर विभाग की पूरी व्यवस्था ही फेल रही?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि करीब 100 करोड़ रुपये लैप्स होने के बाद भी जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई कहां है?
