HamariChoupal,03,04,2026
उत्तराखंड सरकार ने देहरादून वन प्रभाग में 19 हजार से अधिक साल के पेड़ों को काटने की अनुमति केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय से मांगी है. ये पेड़ साल बोरर या होप्लो नामक खतरनाक कीट के लार्वा से प्रभावित पाए गए हैं. वन मंत्री सुबोध उनियाल ने बताया कि प्रभावित पेड़ों को हटाने और कीट नियंत्रण के लिए विशेष ट्री ट्रैप ऑपरेशन चलाने की भी अनुमति मांगी गई है।
वन मंत्री के अनुसार, देहरादून वन प्रभाग के थानो, असरोरी और झाझरा रेंज में साल के पेड़ों पर कीट प्रकोप की सूचना मिलने के बाद वन विभाग ने वन अनुसंधान संस्थान (FRI) के विशेषज्ञों की मदद ली. FRI की टीम ने सर्वे के दौरान 19,170 साल के पेड़ों को कीट से प्रभावित पाया. इनमें कई पेड़ पूरी तरह सूख चुके हैं और उनकी ऊपरी डालियां भी नष्ट हो गई हैं. ऐसे पेड़ों को काटना जरूरी माना गया है ताकि संक्रमण अन्य स्वस्थ पेड़ों तक न फैले।
मानसून में चलेगा ट्री ट्रैप ऑपरेशन
वन विभाग ने बताया कि बाकी प्रभावित क्षेत्रों में मानसून के दौरान ट्री ट्रैप ऑपरेशन चलाया जाएगा. इस प्रक्रिया में कुछ स्वस्थ साल के पेड़ों को काटकर चार-चार फुट लंबे लट्ठों में बदला जाता है और उन्हें बारिश के पानी में रखा जाता है. इन लट्ठों से निकलने वाली गंध कीटों को आकर्षित करती हैं. इसके बाद कीटों को पकड़कर मिट्टी के तेल में डालकर नष्ट किया जाता है. यह अभियान बड़े पैमाने पर चलाया जाता है, जिसमें अक्सर महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों की भी मदद ली जाती है।
साल के पेड़ों के लिए कितना नुकसानदेह है कीट?
विशेषज्ञों के मुताबिक, होप्लो लार्वा साल के पेड़ों की जड़ों और तनों के भीतर घुसकर जाइलम में सुरंग बना लेते हैं. इससे पेड़ अंदर से खोखले हो जाते हैं और धीरे-धीरे सूखकर मर जाते हैं. विशेषज्ञों ने इतनी बड़ी संख्या में साल के पेड़ों के प्रभावित होने को पारिस्थितिक संतुलन के लिए गंभीर खतरा भी बताया है।
उनका कहना है कि ये कीट कठफोड़वा पक्षियों के भोजन का प्राकृतिक स्रोत भी होते हैं. ऐसे में स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र में किसी प्रकार के असंतुलन या जलवायु परिवर्तन की भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा सकता. पिछले वर्ष उत्तराखंड में हुई असाधारण भारी बारिश को भी कीट प्रकोप के संभावित कारणों में माना जा रहा है।
वन मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि इस व्यापक नुकसान के पीछे के कारणों की वैज्ञानिक जांच कराना जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसे प्रकोप को रोका जा सके और साल के जंगलों को सुरक्षित रखा जा सके।
