Hamarichoupal,23,05,2026
2013 में अतिवृष्टि से जब रुद्रप्रयाग का सुदूर गांव पांजणा धंसने के कगार पर था, तब एक शख्स की मातृभूमि के प्रति असाधारण हिम्मत ने पूरे गांव को टूटने से बचा लिया। आज 13 साल बाद उसी पांजणा की तस्वीर बदल चुकी है – जहां अब वनों की आग से सुरक्षा के लिए चौपाल बैठती है और बच्चे सड़क को 22 गज की पिच बनाकर क्रिकेट खेलते हैं।
2013 में गांव के ठीक ऊपर पहाड़ में एक बड़ी दरार आ गई थी। हर रात अनहोनी का डर गांव वालों को दु:स्वप्न देता था। अधिकतर लोग गांव छोड़ने की सोच रहे थे, लेकिन कुछ बुजुर्गों और एक युवक ने गांव न छोड़ने का फैसला किया। उस युवक की हिम्मत और मिट्टी से जुड़ाव ने बाकी ग्रामीणों में भी हौसला भर दिया। उस समय वहां तैनात एक अधिकारी याद करते हैं, “सब डरे हुए थे, लेकिन उनके जज्बे ने पूरे गांव को रोक लिया।”
आज पांजणा में सड़क पहुंच गई है, छोटी-छोटी दुकानें खुल गई हैं और सीमांत खेती से लोग जुड़े हैं। फिर भी गांव शहरी कोलाहल से दूर अपनी गहन शांति और फुरसत के अनगिनत लम्हों को संजोए हुए है। गांव की सबसे खूबसूरत तस्वीर तब दिखती है जब बच्चे सड़क पर ही क्रिकेट खेलने उतरते हैं। विकेट के रूप में घर की पठाल या कोई पत्थर रख दिया जाता है। न तेज धूप की फिक्र, न बेरहम मौसम की परवाह।
उस दौर में वहां तैनात रहे अधिकारी बताते हैं, “मैं अक्सर उनके लिए कास्को की बॉल ले जाता था। जितने भी गांव सड़क से जुड़े थे, वहां कुछ पल के लिए मैं भी उनके खेल में शामिल हो जाता था। वो निश्छल खुशी आज भी याद है।”
आपदा की उस बड़ी दरार से लेकर आज चौपाल में वनों की सुरक्षा पर चर्चा तक, पांजणा ने हिम्मत और हौसले की मिसाल कायम की है। आज सुबह बाबा केदार से प्रार्थना है कि सभी पहाड़ी गांव इसी तरह आबाद और खुशहाल रहें।
