देहरादून(आरएनएस)। छोटे पर्दे पर जब भी किसी अपराध की गुत्थी उलझती थी, एसीपी प्रद्युम्न की गंभीर आवाज गूंजती थी और डीसीपी चित्रोले की एंट्री कहानी में नया मोड़ ले आती थी। ‘कुछ तो गड़बड़ है दया’ और ‘दरवाजा तोड़ दो दया’ जैसे संवादों ने भारतीय टेलीविजन की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। अब इसी दुनिया के चर्चित चेहरे डीसीपी चित्रोले यानी बृजेंद्र पाल सिंह (बीपी सिंह) के निधन से मनोरंजन जगत में शोक की लहर है। बुधवार, 28 अक्टूबर को उन्हें अंतिम विदाई दी जा रही है। रहस्य, रोमांच, अपराध और भय को छोटे पर्दे पर लोकप्रिय मनोरंजन का हिस्सा बनाने वाले बीपी सिंह का उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से गहरा नाता रहा। इसी शहर में उनका जन्म हुआ, यहीं बचपन बीता, यहीं उन्होंने स्कूली और कॉलेज की शिक्षा हासिल की और यहीं से उनके जीवन की शुरुआती यादें जुड़ी रहीं। बहुत कम लोग जानते हैं कि देशभर में पहचान बनाने वाले इस निर्माता-निर्देशक का परिवार देहरादून के चकराता रोड और चाट वाली गली के बीच स्थित भगवान दास क्वार्टर से जुड़ा था। वह वरिष्ठ पत्रकार और उत्तरांचल प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह आर्य के ताऊजी के पुत्र थे।
बीपी सिंह ने भारतीय टेलीविजन को केवल मनोरंजन के नए कार्यक्रम नहीं दिए, बल्कि दर्शकों की देखने और कहानियों से जुड़ने की आदत भी बदली। ‘आहट’ के जरिए उन्होंने घरों में रहस्य और भय का ऐसा माहौल बनाया कि रात के समय प्रसारित होने वाले इस धारावाहिक का नाम सुनते ही दर्शकों के मन में रोमांच जाग उठता था। वहीं ‘सीआईडी’ ने अपराध की जांच, सुरागों की तलाश और अपराधियों तक पहुंचने की प्रक्रिया को एक लोकप्रिय टेलीविजन प्रारूप में ढाल दिया। इस धारावाहिक ने करीब दो दशक तक दर्शकों के बीच अपनी मजबूत जगह बनाए रखी। बीपी सिंह इसकी रचनात्मक दुनिया के निर्माता-निर्देशक होने के साथ खुद भी अभिनय करते रहे। उन्होंने डीसीपी शमशेर सिंह चित्रोले का किरदार निभाया, जो एसीपी प्रद्युम्न के साथ अपने संवादों और टकराव के कारण दर्शकों के लिए खास बन गया।
बृजेंद्र पाल सिंह का जन्म 27 अप्रैल 1949 को देहरादून में हुआ था। उनकी शुरुआती शिक्षा शहर के सीएनआई ब्वॉयज इंटर कॉलेज, जिसे मिशन स्कूल के नाम से भी जाना जाता है, में हुई। उन्होंने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई यहीं से पूरी की। छात्र जीवन में वह स्काउटिंग से भी जुड़े रहे और उन्हें इसके लिए राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने डीएवी कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई की। इसी दौर में उनकी मित्रता पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और देहरादून से आठ बार विधायक रहे स्वर्गीय हरबंस कपूर से भी हुई थी।
वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र सिंह आर्य के अनुसार, हरबंस कपूर जब डीएवी कॉलेज छात्रसंघ के महासचिव पद का चुनाव लड़ रहे थे, तब उनके प्रचार अभियान की तैयारियां भी बीपी सिंह के घर से संचालित होती थीं। पोस्टर और पर्चे तैयार करने से लेकर प्रचार की रणनीति तक, उस दौर की कई यादें परिवार और उनके परिचितों के जेहन में आज भी मौजूद हैं। आगे चलकर जिस व्यक्ति ने कैमरे के पीछे रहकर देशभर के दर्शकों के लिए कहानियां रचीं, उसके जीवन की शुरुआत देहरादून की इन्हीं गलियों और कॉलेज के दिनों से हुई थी।
बीपी सिंह ने फिल्म एवं टेलीविजन की औपचारिक शिक्षा पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) से हासिल की। वर्ष 1973 में उन्होंने मुंबई दूरदर्शन केंद्र में न्यूज कैमरामैन के रूप में काम शुरू किया। समाचारों की दुनिया में कैमरे के पीछे रहकर काम करने के दौरान उन्हें दृश्य, घटनाओं और कहानी को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने का अनुभव मिला। यही अनुभव आगे चलकर उनके रचनात्मक सफर की महत्वपूर्ण पूंजी बना।
बीपी सिंह की दिलचस्पी शुरुआत से ही रहस्य और अपराध पर आधारित कहानियों में रही। उन्होंने केवल कैमरे के पीछे काम करने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि लेखन, निर्माण और निर्देशन की ओर भी कदम बढ़ाया। वर्ष 1985 में दूरदर्शन पर प्रसारित उनकी टेलीफिल्म ‘सिर्फ चार दिन’ इसी रचनात्मक यात्रा का अहम पड़ाव बनी। मर्डर मिस्ट्री पर आधारित इस टेलीफिल्म में अभिनेता नाना पाटेकर ने भी अभिनय किया था।
इसके बाद वर्ष 1988 में उन्होंने मराठी क्राइम थ्रिलर धारावाहिक ‘एक शून्य शून्य’ का निर्माण किया। इसमें शिवाजी साटम ने अभिनय किया, जिन्हें आगे चलकर ‘सीआईडी’ में एसीपी प्रद्युम्न के किरदार से देशभर में पहचान मिली। यह धारावाहिक दूरदर्शन के मुंबई केंद्र से प्रसारित हुआ। अपराध की घटनाओं, जांच और रहस्य को कहानी के केंद्र में रखकर कार्यक्रम तैयार करने की उनकी शैली इसी दौर में आकार लेने लगी थी। आगे चलकर यही शैली उनके सबसे चर्चित टेलीविजन प्रोजेक्ट्स की पहचान बनी।
अक्तूबर 1995 में सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन की शुरुआत के साथ जिन धारावाहिकों ने दर्शकों का ध्यान खींचा, उनमें ‘आहट’ प्रमुख था। बीपी सिंह के निर्माण और निर्देशन से जुड़े इस कार्यक्रम ने भारतीय टेलीविजन पर हॉरर और सुपरनैचुरल कहानियों को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शुरुआत में क्राइम थ्रिलर के रूप में आगे बढ़ा यह धारावाहिक धीरे-धीरे हॉरर की दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने लगा।
‘आहट’ की कहानियों में अनजानी आहटें, रहस्यमय घटनाएं, असामान्य परिस्थितियां और भय पैदा करने वाले दृश्य दर्शकों को बांधे रखते थे। रात के समय इसका प्रसारण घरों में रोमांच और सिहरन का माहौल बना देता था। कार्यक्रम की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2015 तक इसके छह सीजन प्रसारित हुए। अलग-अलग समय पर ओम पुरी, आशुतोष राणा, टॉम ऑल्टर, मंदिरा बेदी और शिवाजी साटम जैसे कलाकार भी इससे जुड़े।
‘आहट’ की खासियत यह थी कि इसकी कहानियां हर बार दर्शकों को एक नए रहस्य के सामने खड़ा कर देती थीं। भय को केवल डरावने चेहरों या आवाजों तक सीमित रखने के बजाय वातावरण, घटनाक्रम और कहानी के माध्यम से प्रभाव पैदा करना बीपी सिंह की रचनात्मक शैली का हिस्सा रहा। इस धारावाहिक ने टेलीविजन पर हॉरर को एक नियमित और लोकप्रिय विधा के रूप में स्थापित करने में योगदान दिया।
वर्ष 1998 में शुरू हुआ ‘सीआईडी’ बीपी सिंह के करियर की सबसे बड़ी पहचान बना। अपराध की जांच पर आधारित इस धारावाहिक ने रहस्य, सुराग, वैज्ञानिक जांच और पुलिस अधिकारियों के बीच तालमेल को मनोरंजक अंदाज में प्रस्तुत किया। एसीपी प्रद्युम्न, इंस्पेक्टर दया, अभिजीत, डॉ. सालुंके, फ्रेडी, पूर्वी और तारिका जैसे किरदारों ने धीरे-धीरे दर्शकों के बीच अपनी अलग जगह बना ली।
‘सीआईडी’ की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण इसकी कहानियों की प्रस्तुति थी। हर एपिसोड में कोई नया मामला, जांच की नई दिशा और अपराधी तक पहुंचने के लिए जुटाए जाने वाले सुराग दर्शकों की उत्सुकता बनाए रखते थे। कई बार कहानी के बीच आने वाले मोड़ दर्शकों को अंतिम क्षण तक यह अनुमान लगाने पर मजबूर कर देते थे कि अपराध के पीछे कौन है।
बीपी सिंह इस धारावाहिक के निर्माण और निर्देशन से जुड़े रहे। उन्होंने खुद भी इसमें डीसीपी शमशेर सिंह चित्रोले का किरदार निभाया। पर्दे पर चित्रोले और एसीपी प्रद्युम्न के बीच होने वाली नोकझोंक तथा प्रशासनिक और पेशेवर टकराव ने कहानी में अलग रंग भरा। गंभीर व्यक्तित्व, सख्त अंदाज और प्रभावशाली संवादों के कारण चित्रोले का किरदार दर्शकों की स्मृतियों में दर्ज हो गया।
वर्ष 1998 से 2018 तक लगभग 20 वर्षों के सफर ने ‘सीआईडी’ को भारतीय टेलीविजन के लंबे समय तक चलने वाले चर्चित धारावाहिकों में शामिल कर दिया। एसीपी प्रद्युम्न के संवाद ‘कुछ तो गड़बड़ है दया’ और ‘दरवाजा तोड़ दो दया’ लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन गए। इन संवादों की नकल, हास्य प्रस्तुतियों और सोशल मीडिया के दौर में भी इस धारावाहिक के किरदारों की चर्चा जारी रही। ‘सीआईडी’ की लोकप्रियता ने यह भी दिखाया कि भारतीय दर्शकों के बीच अपराध और जांच पर आधारित कहानियों की व्यापक संभावनाएं हैं।
बीपी सिंह की पहचान केवल लोकप्रिय धारावाहिक बनाने तक सीमित नहीं रही। उन्होंने टेलीविजन निर्माण में नए प्रयोग भी किए। वर्ष 2004 में ‘सीआईडी’ के 111वें एपिसोड के लिए 111 मिनट का निरंतर सिंगल शॉट शूट किया गया। यह प्रयोग लंबे समय तक बिना कट के दृश्य फिल्माने की चुनौती के कारण चर्चा में रहा। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, इस उपलब्धि को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स और लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया। किसी धारावाहिक में इतने लंबे समय तक निरंतर शॉट बनाए रखना कलाकारों, कैमरा टीम और तकनीकी कर्मचारियों के लिए बड़ी चुनौती होती है। इसमें संवाद, अभिनय, कैमरे की गति और दृश्यों के क्रम के बीच तालमेल बनाए रखना पड़ता है। इस प्रयोग ने बीपी सिंह की तकनीकी समझ और नए तरीके आजमाने की प्रवृत्ति को सामने रखा। वर्ष 2010 में उन्होंने सोनी टीवी पर ‘गुटुर गु’ नाम से मूक कॉमेडी धारावाहिक भी प्रस्तुत किया। इसमें संवादों के बजाय हाव-भाव, शारीरिक अभिनय और दृश्यात्मक हास्य के जरिए कहानी कही जाती थी। वर्ष 2014 तक इसके तीन सीजन प्रसारित हुए। अपराध और हॉरर जैसे गंभीर विषयों के लिए पहचाने जाने वाले बीपी सिंह ने इस कार्यक्रम के जरिए अपनी रचनात्मक क्षमता का एक अलग पक्ष भी दिखाया।
बीपी सिंह का पेशेवर सफर उन्हें भारतीय टेलीविजन के महत्वपूर्ण रचनाकारों में शामिल करने के साथ फिल्म और टेलीविजन प्रशिक्षण की दुनिया तक भी ले गया। उन्होंने पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से प्रशिक्षण लिया था। बाद में वर्ष 2018 में उन्हें इसी प्रतिष्ठित संस्थान का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। यह उनके करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव था, क्योंकि जिस संस्थान में उन्होंने अपने पेशेवर जीवन के लिए प्रशिक्षण हासिल किया था, उसी के नेतृत्व की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई।
वह भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन निर्देशक संघ (आईएफटीडीए) के अध्यक्ष भी रहे। कैमरे के पीछे काम करने वाले तकनीकी कर्मी से लेकर निर्माता-निर्देशक और संस्थान के अध्यक्ष तक का उनका सफर भारतीय मनोरंजन उद्योग में उनके लंबे अनुभव को दर्शाता है। उन्होंने अपने करियर में अभिनय, निर्देशन, निर्माण और टेलीविजन के तकनीकी पक्षों को करीब से समझा तथा अलग-अलग भूमिकाओं में काम किया।
देहरादून से बीपी सिंह का रिश्ता केवल जन्मस्थान तक सीमित नहीं था। उनका बचपन और युवावस्था का एक हिस्सा चकराता रोड और चाट वाली गली के बीच स्थित भगवान दास क्वार्टर में बीता। उनके पिता क्षेत्रपाल सिंह ने फोटोग्राफी के क्षेत्र में काम किया था। परिवार के सदस्यों के अनुसार, बीपी सिंह के पिता और सुरेंद्र सिंह आर्य के पिता ने पढ़ाई पूरी करने के बाद मसूरी के गोयल स्टूडियो में फोटोग्राफी सीखी थी। इसके बाद क्षेत्रपाल सिंह ने देहरादून की चकराता रोड पर ‘पाल स्टूडियो’ नाम से अपना फोटोग्राफी व्यवसाय शुरू किया। सुरेंद्र सिंह आर्य बताते हैं कि उनके पिता चार भाई थे और बीपी सिंह उनके ताऊजी के पुत्र थे। ताऊजी के तीन पुत्रों में बीपी सिंह मंझले थे। परिवार का एक हिस्सा आज भी भगवान दास क्वार्टर में रहता है। इस तरह देहरादून की एक पुरानी आवासीय बस्ती से जुड़ा परिवार आगे चलकर भारतीय टेलीविजन के चर्चित नामों में शामिल हुआ। बीपी सिंह की कहानी शहर के उस दौर की भी याद दिलाती है, जब फोटोग्राफी स्टूडियो केवल तस्वीरें खिंचवाने की जगह नहीं, बल्कि कैमरे और दृश्य कला से परिचित होने का माध्यम भी हुआ करते थे। उनके पिता का फोटोग्राफी से जुड़ाव और बीपी सिंह का आगे चलकर कैमरे के माध्यम से कहानियां रचने वाला पेशा, परिवार की इस पृष्ठभूमि को खास बनाता है। बीपी सिंह के जीवन से जुड़ी कई यादें देहरादून के पुराने सामाजिक और शैक्षणिक परिवेश में बिखरी हुई हैं। स्वर्गीय हरबंस कपूर के साथ उनकी मित्रता कॉलेज के दिनों से थी। सुरेंद्र सिंह आर्य के मुताबिक, डीएवी कॉलेज में छात्र राजनीति के दौरान कपूर के चुनाव प्रचार की तैयारियां बीपी सिंह के घर से होती थीं। पोस्टर और पर्चे तैयार करने जैसे कामों में उनका सहयोग रहा।
बाद में हरबंस कपूर उत्तराखंड की राजनीति में एक प्रमुख नाम बने, जबकि बीपी सिंह ने मुंबई में रहकर मनोरंजन की दुनिया में अपनी पहचान बनाई। दोनों के अलग-अलग क्षेत्रों में आगे बढ़ने के बावजूद उनके शुरुआती जीवन की यह कड़ी देहरादून की साझा स्मृतियों का हिस्सा है। बीपी सिंह के निधन पर भाजपा के वरिष्ठ नेता और डीएवी कॉलेज के पूर्व प्रचार प्रमुख डॉ. देवेंद्र भसीन ने भी शोक व्यक्त किया। डॉ. भसीन का भी पूर्व में भगवान दास क्वार्टर में पाल परिवार के पड़ोसी के रूप में जुड़ाव रहा था। उनके निधन से उन लोगों के बीच भी शोक है, जो उन्हें केवल टेलीविजन के पर्दे पर नहीं, बल्कि देहरादून के अपने परिचित परिवेश से जुड़े व्यक्ति के रूप में जानते थे।
बीपी सिंह का जीवन इस बात का उदाहरण है कि छोटे शहरों से निकलकर भी प्रतिभा राष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बना सकती है। देहरादून में जन्मे और पले-बढ़े बीपी सिंह ने मुंबई में दूरदर्शन के न्यूज कैमरामैन के रूप में करियर शुरू किया। इसके बाद लेखन, निर्माण और निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखते हुए उन्होंने ‘सिर्फ चार दिन’, ‘एक शून्य शून्य’, ‘आहट’ और ‘सीआईडी’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी अलग शैली विकसित की। उनकी रचनात्मक दुनिया में अपराध की गुत्थियां भी थीं, अनजाने भय की कहानियां भी और बिना संवाद के हंसाने वाला हास्य भी। उन्होंने दर्शकों को डराया, चौंकाया, हंसाया और कई बार आखिरी दृश्य तक रहस्य में उलझाए रखा। उनके बनाए किरदारों और धारावाहिकों की लोकप्रियता ने टेलीविजन मनोरंजन के एक लंबे दौर को आकार दिया। अब बीपी सिंह के निधन के साथ उनके जीवन का सफर समाप्त हो गया है, लेकिन ‘आहट’ की सिहरन और ‘सीआईडी’ की जांच-पड़ताल से जुड़ी यादें दर्शकों के बीच बनी रहेंगी। देहरादून के भगवान दास क्वार्टर से शुरू होकर भारतीय टेलीविजन के बड़े मंच तक पहुंचा उनका सफर शहर के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्मृति है। पर्दे पर डीसीपी चित्रोले की सख्त आवाज अब नई कहानियों में सुनाई नहीं देगी, लेकिन उनके बनाए किरदार और उनके काम की छाप लंबे समय तक दर्शकों की यादों में जीवित रहेगी।
अलविदा डीसीपी चित्रोले! देहरादून के भगवान दास क्वार्टर से निकलकर देशभर में छाए बीपी सिंह
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