आरएनएस/ एजेंसी
देहरादून। स्वतंत्रता दिवस 2026 के अवसर पर देशभर के पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को मिलने वाले राष्ट्रपति पुलिस पदकों की घोषणा के बीच उत्तराखंड पुलिस मुख्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि पुलिस पदकों के लिए केंद्र सरकार के निर्धारित पोर्टल पर समय सीमा के भीतर उत्तराखंड पुलिस की ओर से पात्र अधिकारियों-कर्मचारियों के नाम और प्रस्ताव उपलब्ध नहीं कराए जा सके। इसके चलते राज्य के कई पात्र पुलिसकर्मी राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित सम्मान से वंचित रह गए।
मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि पुलिस पदकों के लिए केंद्र सरकार ने ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से नामांकन और प्रस्ताव भेजने की समय सीमा निर्धारित की थी। इसके बावजूद पुलिस मुख्यालय स्तर पर पात्रता सूची तैयार करने और प्रस्तावों को निर्धारित समय में आगे बढ़ाने में कथित तौर पर लापरवाही बरती गई।
जानकारी के मुताबिक पुलिस पदकों के लिए विभिन्न स्तरों से पात्र अधिकारियों और कर्मचारियों के नाम प्रस्तावित किए जाते हैं। इसके बाद संबंधित विभाग प्रस्तावों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत केंद्र सरकार के पास भेजता है। आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया में उत्तराखंड पुलिस मुख्यालय समयसीमा का पालन नहीं कर सका। शासन स्तर से भी इस मामले को गंभीरता से लिए जाने की बात सामने आ रही है। गृह सचिव शैलेश बगोली की ओर से भी मामले में पुलिस मुख्यालय से जवाब मांगे जाने की चर्चा है। यदि यह तथ्य सही साबित होता है कि निर्धारित समय के बावजूद प्रस्ताव तैयार नहीं किए गए या समय पर पोर्टल पर अपलोड नहीं किए गए, तो यह महज प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि उन पुलिसकर्मियों के साथ गंभीर अन्याय माना जाएगा, जिन्होंने वर्षों तक उल्लेखनीय सेवाएं दी हैं।
होमगार्ड और कारागार विभाग के नाम पहुंचे, पुलिस क्यों पीछे रह गई?
मामले ने इसलिए और ज्यादा सवाल खड़े किए हैं क्योंकि अन्य संबंधित श्रेणियों में समय पर प्रस्ताव भेजे जाने के बाद सम्मान प्राप्त हुए हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब विभागीय स्तर पर पदकों की प्रक्रिया और समयसीमा स्पष्ट थी, तो उत्तराखंड पुलिस मुख्यालय अपने पात्र पुलिसकर्मियों के नाम समय पर क्यों नहीं भेज पाया?
यदि पोर्टल की समय सीमा समाप्त होने के कारण नामांकन ही स्वीकार नहीं हुए, तो इसका सीधा नुकसान उन पुलिसकर्मियों को हुआ जो सम्मान के पात्र हो सकते थे।
मुख्यमंत्री पदक से सम्मान, लेकिन राष्ट्रीय पदक से चूक!
विडंबना यह है कि स्वतंत्रता दिवस 2026 के अवसर पर उत्तराखंड सरकार ने राज्य के 14 पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को मुख्यमंत्री सराहनीय सेवा पदक से सम्मानित किया है। यानी राज्य स्तर पर पुलिसकर्मियों की सेवाओं को पहचान मिली, लेकिन राष्ट्रीय स्तर के राष्ट्रपति पुलिस पदकों की प्रक्रिया में कथित प्रशासनिक चूक ने पूरे मामले को विवादों में ला दिया। इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या राज्य स्तर पर सम्मान के लिए जिन अधिकारियों-कर्मचारियों की सेवाओं को उत्कृष्ट माना गया, उनमें से पात्र पुलिसकर्मियों को राष्ट्रीय पदक के लिए भी समय रहते विचाराधीन किया गया था?
जिम्मेदारी किसकी?
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल जिम्मेदारी का है।
क्या पुलिस मुख्यालय में पदक संबंधी प्रस्तावों की निगरानी के लिए जिम्मेदार अधिकारी समय सीमा से अनजान थे?
क्या पात्र पुलिसकर्मियों की सूची समय पर तैयार नहीं हुई?
क्या प्रस्ताव तैयार होने के बावजूद उन्हें पोर्टल पर अपलोड नहीं किया गया?
क्या समयसीमा समाप्त होने से पहले शासन स्तर पर इसकी जानकारी दी गई थी?
और सबसे बड़ा सवाल—यदि चूक हुई तो इसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी की है?
पुलिस विभाग में छोटी सी प्रशासनिक गलती का असर आमतौर पर किसी एक फाइल तक सीमित नहीं रहता। लेकिन यहां कथित चूक का असर सीधे उन पुलिसकर्मियों के सम्मान पर पड़ा है, जिनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर पदक के लिए प्रस्तावित किया जा सकता था।
जांच और जवाबदेही जरूरी
मामले में अब केवल खानापूर्ति की जांच के बजाय यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि केंद्र सरकार की समय सीमा क्या थी, उत्तराखंड पुलिस मुख्यालय को प्रस्ताव तैयार करने के लिए कब और किस स्तर पर निर्देश मिले, पात्र पुलिसकर्मियों की सूची कब तैयार हुई और पोर्टल पर कितने प्रस्ताव अपलोड किए गए। यदि प्रस्ताव समय पर नहीं भेजे गए तो संबंधित अधिकारी की भूमिका और जिम्मेदारी भी सार्वजनिक होनी चाहिए।
पुलिसकर्मी अपराधियों से लड़कर राज्य की सुरक्षा करते हैं। ऐसे में यदि किसी अधिकारी की प्रशासनिक लापरवाही के कारण कोई पात्र पुलिसकर्मी राष्ट्रीय सम्मान से वंचित रह गया है, तो यह केवल एक पदक का मामला नहीं, बल्कि पूरे पुलिस बल के मनोबल से जुड़ा सवाल है। अब निगाह शासन की जांच और पुलिस मुख्यालय के जवाब पर है कि आखिर राष्ट्रीय सम्मान की इस दौड़ में उत्तराखंड पीछे क्यों रह गया और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
