बच्चे के जन्म के बाद कुछ अस्पतालों में नियोनेटल हियरिंग स्क्रीनिंग नहीं हो पाती है. इस कारण यह पता नहीं लग पाता है कि बच्चा के सुनने की क्षमता कैसी है. ऐसे में एम्स दिल्ली इस दिशा में प्रयास कर रहा है कि गर्भ में ही बच्चे के सुनने की क्षमता का पता चल जाए.

एम्स दिल्ली के डॉक्टर इस प्रयास में है कि बच्चे के जन्म से पहले यानी गर्भ में ही ये पता चल जाए कि बच्चा सुन पा रहा है या नहीं. एम्स में ईएनटी विभाग के प्रोफेसर डॉ. कपिल सिक्का ने टीवी9 भारतवर्ष से खास बातचीत में बताया कि विभाग इस प्रयास में है कि गर्भ में ही ये पता लग जाए कि बच्चे के सुनने की क्षमता कैसी है. मां के गर्भ में पल रहे बच्चे के सुनने की क्षमता को लेकर कुछ टेस्ट होते हैं. उन टेस्ट के माध्यम से यह पता लगाया जाता है कि उसके सुनने की शक्ति कितनी है.
उन्होंने कहा कि परेशानी इस बात की है कि इसका इलाज तभी संभव है जब एक बार बच्चे का जन्म हो जाए. लेकिन कुछ तरीकें ऐसे भी हैं जो गर्भ में ही इस बात की जानकारी दे सकते हैं. विभाग उन्हीं तरीकों पर काम कर रहा है.डॉ कपिल ने कहा कि नए जन्मे बच्चों में सुनने में कमी का पता लगाने पर भी ज़ोर दिया जाना चाहिए. जैसे कि नियोनेटल हियरिंग स्क्रीनिंग की जानी चाहिए. जो जन्म के 24 से 48 घंटे बाद की जा सकती है. हमारे इंस्टीट्यूट में हम यूनिवर्सल नियोनेटल हियरिंग स्क्रीनिंग कर रहे हैं.
जन्म के बाद क्यों जरूरी है स्क्रीनिंग?
डॉ. सिक्का ने कहा कि अगर जन्म के पहले छह महीनों में सुनने की समस्या की पहचान हो जाए तो इलाज के बेहतर परिणाम मिलते हैं और बच्चे के भाषा विकास पर भी गंभीर असर नहीं होता है, लेकिन कई मामलों में जन्म के बाद बच्चे की नियोनेटल हियरिंग स्क्रीनिंग नहीं की जाती है. इस वजह से यह पता ही नहीं चल पाता है कि बच्चा सुन पा रहा है या नहीं. जन्म वह 1 साल के करीब का हो जाता है और आवाज पर प्रतिक्रिया नहीं देता है तब माता- पिता को पता चलता है कि बच्चे को कोई समस्या है. ऐसे में एम्स इस दिशा में काम कर रहा है कि गर्भ में ही बच्चे के सुनने की क्षमता की जांच हो जाए.
बच्चे में सुनने की परेशानी है तो क्या है उपाय
डॉ कपिल ने कहा क ज़्यादातर मामलों में, जिन शिशुओं को सुनने में बहुत ज़्यादा कमी का पता चला है, उन्हें कॉक्लियर इम्प्लांट से ठीक किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि ऑडिटरी ब्रेन स्टेम इम्प्लांट जैसी तरक्की ने ज़्यादा मुश्किल नर्व डेफनेस वाले मामलों में सुनने की क्षमता को ठीक करने में मदद की है.
