HamariChoupal,28,03,2026
अनुराग गुप्ता
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत एक बार फिर करवट लेती नजर आ रही है। लंबे समय से मजबूत पकड़ बनाए बैठी भाजपा के भीतर बढ़ती असंतुष्टि अब सतह पर आने लगी है। वहीं कांग्रेस इस मौके को एक बड़े राजनीतिक अवसर के रूप में देख रही है। हालिया घटनाक्रमों ने यह संकेत देना शुरू कर दिया है कि आने वाले समय में राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव है।
उत्तराखंड में भाजपा लंबे समय से सत्ता में है, लेकिन सत्ता का यह स्थायित्व अब पार्टी के भीतर ही सवालों के घेरे में आता दिख रहा है। संगठन और सरकार के बीच तालमेल की कमी, पुराने नेताओं की अनदेखी और निर्णय प्रक्रिया में सीमित लोगों की भूमिका—ये सभी कारण धीरे-धीरे असंतोष को जन्म दे रहे हैं। कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि पार्टी अब “कार्यकर्ता आधारित संगठन” से हटकर “केंद्रीकृत नेतृत्व” की ओर बढ़ रही है, जहां जमीनी स्तर के अनुभवी नेताओं की भूमिका सीमित हो गई है। यही कारण है कि वर्षों तक पार्टी को मजबूत करने वाले कुछ नेता अब खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे हैं।
दूसरी ओर कांग्रेस इस असंतोष को अपने पक्ष में भुनाने की रणनीति पर काम कर रही है। हाल के दिनों में भाजपा के कुछ पुराने और प्रभावशाली चेहरों का कांग्रेस में शामिल होना इस रणनीति की सफलता का संकेत देता है। कांग्रेस के लिए यह सिर्फ ‘जॉइनिंग’ नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश है—कि भाजपा के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। पार्टी अब उन नेताओं को मंच देने की कोशिश कर रही है जो भाजपा में खुद को उपेक्षित मान रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अभी कई बड़े नाम खुलकर सामने नहीं आए हैं, लेकिन वे स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। ये नेता फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में हैं और सही समय का इंतजार कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, यदि आने वाले महीनों में हालात नहीं सुधरे, तो भाजपा को और बड़े झटके लग सकते हैं। यह भी माना जा रहा है कि कुछ नेता चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखते हुए अंतिम समय में पाला बदल सकते हैं। उत्तराखंड की राजनीति में दलबदल कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग नजर आ रहा है। यह सिर्फ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का मामला नहीं बल्कि संगठनात्मक असंतोष का परिणाम भी माना जा रहा है। अगर यह सिलसिला जारी रहता है, तो यह भाजपा के लिए सिर्फ संख्या का नहीं बल्कि मनोबल का भी बड़ा झटका साबित हो सकता है। वहीं कांग्रेस के लिए यह पुनर्जीवन का अवसर बन सकता है।
उत्तराखंड की राजनीति फिलहाल एक संक्रमणकाल से गुजर रही है। भाजपा के भीतर उठ रहे असंतोष के स्वर और कांग्रेस की सक्रिय रणनीति मिलकर एक नए राजनीतिक समीकरण को जन्म दे सकते हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह हलचल सिर्फ कुछ चेहरों तक सीमित रहती है या फिर यह राज्य की सत्ता की दिशा ही बदल देती है। फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड की राजनीति अब शांत नहीं, बल्कि ‘साइलेंट शिफ्ट’ के दौर में प्रवेश कर चुकी है।
